सिनेमा आर्ट का आइना है तमिल फिल्म कर्नन

Bollywood Hangover 2021-05-23T09:06:30+01:00 Movie Review

 

सिनेमा आर्ट क्या है, अगर उसको जानना समझना हो तो तमिल फिल्म कर्नन जरूर देखनी चाहिए। इसमें कथा और फिल्मांकन, दोनों रूपों केे ढेरों रंग देखे जा सकते हैं। ठीक वैसे ही जैसे हम सैराट वाले मराठी फिल्मकार नागराज मुंजले के सिनेमा में दिखते हैं।

Mari Selvaraj की कर्नन फिल्म जिस बिंदु पर खड़ी है वह भारत की आत्मा है। उसमें जो बहाव है वो हमारी सामाजिक संरचना के हर उस पहलू को दिखाता है जो प्राय: अनदेखा कर दिया गया है या उसकी मौजूदगी को वहां तक और उस रूप में दिखाया जाता है जिससे सामाजिक रूप से ताकतवर लोगों को बुरा न लगे।

जो सिनेमा में पहाड़, उपत्यका, अदाएं देखना चाहते हैं उन्हें निराशा होगी। इस तरह के ईमानदार सिनेमा में उनकी गुंजाइश ही नहीं होती। लेकिन पर्यावरण के वे हिस्से जरूर हैं जो हमारे साथ होते हैं। सिनेमा में तितली भी है लेकिन वह तितली एकरंगी है। कुलाचें मारते हिरन और उसके शावक नहीं इसमें लेकिन बंधे पैरों वाला गधा, सुअर और सुअर के पिल्ले हैं। हिरन जिंदगी का नहीं तसुव्वर का हिस्सा होते हैं, पर सुअर, घोड़ा और गधा जिंदगी में कहीं न कहीं सने हैं, गुंथे हैं। इसमें नदियां और झरने नहीं हैं। तलैया है, ठहरा हुआ पानी है।

बम प्लांट करने, बिल्डिंग उड़ा देने की धमकियां नहीं है फिल्म में। समस्या यह है कि गांव के नजदीक कोई बस स्टॉंप नहीं है। यही वह बिंदु है जहां से तनाव उपजता है और आगे चल कर सामूहिक आक्रोश में बदल जाता है।

जब फिल्म देख रहा था तो ध्यान आया कि आमिर खान की फिल्म लगान का कथानक भी यही है। गांव की सबसे बड़ी समस्या को लेकर नायक भुवन सबको एक करता है और फिर वैध सत्ता तक को धाराशायी कर देता है। हालांकि कर्नन के पास ऐसी सुविधा नहीं है कि वह एक खेल में ताकतवर को हरा दे। यहीं पर कर्नन, भुवन से अलग हो जाता है।

कर्नन के पास कई सवाल हैं और वह उनके जबाव सिनेमा के अंत में प्रतिनायक से पूछता है। उसका मासूम सा सवाल यह है कि उसके गांव वाले राजाओं वाले नाम क्यों नहीं रख सकते।

कर्नन गांधीवादी रास्ता नहीं अपनाता। वह जबाव देता है अपनी तरह से। वह जबाव जो उसे उन हालातों में समझ में आता है। कर्नन हिंसा को साधन मानता है।

फिल्म की कथा में नामों को लेकर एक परत है जिसे थोड़ा रूक कर खुरेचने की जरूरत पड़ती है। नायक है कर्ण (कर्नन) और नायिका है द्रौपदी। प्रतिनायक का नाम कन्नाबीरन है। कन्नाबीरन कृष्ण का दूसरा नाम है। गांव के मुखिया का नाम है दुर्योधन। यह कर्ण मछली की आंख में तीर नहीं मारता बल्कि हवा में तैरती मछली के दो टुकड़े कर देता है। मगर उसकी जीत द्रौपदी के लिए नहीं अपने गांव पोडियानकुलम के लिए है।

फिल्म एक सच्ची घटना पर आधारित है। 31 अगस्त, 1995 में तमिलनाडु के थोट्टीकुड़ी जिले के कोडियानकुलम गांव में पुलिस ने अपना कहर बरपाया था और सुबह 10.45 से लेकर 3.15 तक गांव में 600 पुलिस कर्मी तांडव मचाते रहे थे और समूचे गांव को मटियामेट कर दिया गया था।

                                                                                        ------ Journo Shobhit Jaiswal

 

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